दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में हाईकोर्ट के आदेशों की खुलेआम अवहेलना हो रही है। रेलवे अधिकारियों ने शपथ पत्र देकर दावा किया था कि कोयले का परिवहन तिरपाल से ढंककर किया जा रहा है, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा। मालगाड़ियों से उड़ती कोल डस्ट पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है, लेकिन रेलवे प्रशासन इसे रोकने के बजाय नजरअंदाज कर रहा है। बिलासपुर रेल मंडल के बृजरानगर, झारसुगुड़ा, कोरबा और उमरिया समेत कई कोल साइडिंग से देशभर के उद्योगों को कोयला भेजा जाता है। ग्रीन ट्रिब्यूनल के नियमों के तहत रेलवे को कोयला लोड करने के बाद तिरपाल से ढंकना अनिवार्य है, ताकि कोल डस्ट से प्रदूषण न फैले। लेकिन रेलवे अधिकारियों के मौखिक आदेश पर इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि अफसर तिरपाल लगाने को महंगा और समय लेने वाला बताकर इसे नजरअंदाज कर रहे हैं।इस मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई थी, जिसमें बिना तिरपाल ढंकी मालगाड़ियों के फोटो और वीडियो सबूत के तौर पर पेश किए गए। हाईकोर्ट ने रेलवे से जवाब तलब किया, जिस पर अफसरों ने लिखित में दावा किया कि कोयला पूरी तरह तिरपाल से ढंककर ही भेजा जा रहा है।अदालत ने इस बयान को मानकर मामला खत्म कर दिया,लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है।इस सम्बंध में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता ने कहा कि नियम कहता है कि कोयला कहीं से भी निकले ढककर ही परिवहन करना चाहिए।अन्यथा ऐसे नियम विपरीत जाने पर सख्त कार्यवाही का प्रावधान है।इसके साथ ही उन्होंने अन्य जानकारी भी साझा की। रेलवे कर्मचारियों का कहना है कि अधिकारियों के दबाव में वे नियमों का उल्लंघन करने को मजबूर हैं।मालगाड़ियों को बिना तिरपाल के रवाना करने के मौखिक आदेश दिए जाते हैं, जिससे रेलवे का समय और खर्च बचाया जा सके। एक मालगाड़ी में 58 वैगन होते हैं और तिरपाल लगाने में करीब एक घंटे का अतिरिक्त समय लगता है, जिसे बचाने के लिए अधिकारियों ने नियमों को ताक पर रख दिया है।हालांकि जब इस सम्बंध में सीपीआरओ से बात हुई तो उन्होंने इसका गोलमोल जवाब दे दिया। पर्यावरणविदों का कहना है कि रेलवे की लापरवाही से कोल डस्ट फैलकर स्थानीय आबादी को नुकसान पहुंचा रही है। हवा में घुलता कोयले का बारीक धुआं लोगों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। वहीं, नियमों की अनदेखी से प्रदूषण नियंत्रण उपायों पर भी सवाल उठ रहे हैं।अब देखना होगा कि क्या रेलवे प्रशासन इस पर कोई ठोस कदम उठाता है या फिर इसी तरह कोर्ट को गुमराह कर प्रदूषण को बढ़ावा देता रहेगा।


