
बिलासपुर। सरकंडा क्षेत्र में रहने वाले नंदकिशोर शुक्ला पिछले 30 वर्षों से छत्तीसगढ़ी भाषा को उसका हक दिलाने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। वर्ष 1996 से उन्होंने यह मुहिम शुरू की थी कि छत्तीसगढ़ी भाषा में शिक्षा को महत्व दिया जाए और इसे विद्यालयों तथा महाविद्यालयों में अध्ययन का हिस्सा बनाया जाए। नंदकिशोर शुक्ला ने बताया कि अपनी इस लड़ाई को वे केवल मंचों और कागजों तक सीमित नहीं रखते, बल्कि जमीनी स्तर पर लोगों तक पहुँचाने के लिए कई बार सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा भी कर चुके हैं। इस दौरान उन्होंने ग्रामीणों, विद्यार्थियों और शिक्षकों को छत्तीसगढ़ी भाषा की अहमियत समझाई। उनकी इस पहल का असर भी देखने को मिला है। स्थानीय स्तर पर अब कई लोग छत्तीसगढ़ी भाषा की उपयोगिता को समझने लगे हैं और इसे बढ़ावा देने की बात कर रहे हैं। नंदकिशोर शुक्ला का मानना है कि भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति और पहचान की आत्मा होती है। शुक्ला चाहते हैं कि राज्य सरकार छत्तीसगढ़ी भाषा में स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा प्रारंभ करे, ताकि आने वाली पीढ़ी अपनी भाषा, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रह सके। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ की मिट्टी और बोली को सम्मान मिलना ही सच्चा छत्तीसगढ़िया जिंदाबाद होगा। लगातार तीन दशकों से चल रही इस जंग में नंदकिशोर शुक्ला आज भी डटे हुए हैं। तमाम कठिनाइयों और चुनौतियों के बावजूद वे हार नहीं माने हैं। उनका सपना है कि एक दिन छत्तीसगढ़ी भाषा को न सिर्फ शिक्षा में, बल्कि प्रशासनिक कार्यों में भी पूरा सम्मान मिले।


