रविवार प्रातः रेलवे क्षेत्र स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में नेत्र उत्सव मनाया गया। 14 दिन के बाद एक बार फिर से मंदिर के पट भक्तों के लिए खुल गए। साथ ही रथ यात्रा की तैयारी भी देखी गई।

भगवान जगन्नाथ की लीलाएं अपरंपार है । 15 दिन पहले देव स्नान पूर्णिमा पर 108 कलश जल से स्नान करने के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन चक्र की तबीयत खराब हो गई थी, जिसके बाद मंदिर के दरवाजे बंद कर 14 दिनों तक उनका विशेष उपचार पुजारी द्वारा किया गया। अब 14 दिन बाद भगवान जगन्नाथ ने स्वस्थ होकर भक्तों को दर्शन दिया है। यह दिन नेत्र उत्सव है। जिसे नवजोबन उत्सव भी कहा जाता है। ऐसा 72 साल बाद हुआ है जब एक ही दिन नेत्र उत्सव और रथ यात्रा का पर्व मनाया जा रहा है। परंपरा अनुसार आषाढ़ मास शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को नेत्र उत्सव मनाया जाता है।


नेत्र उत्सव में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को नए नेत्र प्रदान किए जाते हैं, इन्हीं विशाल नेत्रों से वे भक्तों को आशीर्वाद देते हैं ।माना जाता है की लंबी बीमारी के बाद स्वस्थ होने पर उन्हें नवजीवन मिला है इसीलिए इसे नवजोबन उत्सव भी कहा जाता है। इस दिन तीनों भगवान को नव कलेवर धारण कराया गया। प्रतिमाओं पर चंदन का लेप लगाया गया और विशेष औषधि एवं जड़ी बूटी से उनकी सेवा की गई, इसे खाली प्रसाद लगी नीति और घाना लागी गुप्त नीति कहा जाता है। भक्तों के लिए इनका दर्शन अलौकिक रहा। परंपरा अनुसार इस दिन मंदिर के शिखर पर नया ध्वज लगाया गया।


हर वर्ष आषाढ़ शुक्ल पक्ष द्वितीया पर भगवान जगन्नाथ रथ पर सवार होकर देवी गुंडिचा के मंदिर जाते हैं। यही रथ यात्रा है। मान्यता है कि राजा धृष्टद्युम्न और उनकी पत्नी देवी गुंडिचा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान जगन्नाथ ने उन्हें यह वर दिया था कि वे इस तिथि पर उनके घर सेवा प्राप्त करने के लिए आएंगे। इस परंपरा का निर्वहण आज भी किया जा रहा है। इस वर्ष श्री जगन्नाथ मंदिर बिलासपुर में छेरा पहरा की रस्म उप मुख्यमंत्री अरुण साब निभाएंगे। दोपहर 2:00 बजे यह रथ यात्रा श्री मंदिर से निकलकर तितली चौक, स्टेशन, बड़ा गिरजा, तार बाहर, गांधी चौक होते हुए वापस श्री मंदिर के बगल में बने अस्थाई गुंडीचा मंदिर पहुंचेगी, जहां आगामी 15 जुलाई तक विविध सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होगा। इस वर्ष 16 जुलाई को बहुड़ा यात्रा आयोजित होगी।


