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एसटी-एससी ओबीसी महासंघ के आक्रोशित “भारत बंद” ऐलान का नहीं दिखा कुछ खास असर, शैक्षणिक संस्थान रोज के तरह खुले रहे।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को असंवैधानिक बताते हुए एसटी-एससी ओबीसी महासंघ ने बुधवार को बिलासपुर बंद का आवाह्न किया था लेकिन भारत बंद बेअसर रहा, शहर में कहीं भी कोई खास फर्क नहीं दिखा। सभी शैक्षिक संस्थान रोज की तरह खुले रहे। वहां पढ़ाई सुचारू रूप से चलती रही, एक दिन पहले मंगलवार को एसटीएससी ओबीसी महासंघ द्वारा सभी संस्थाओं को बंद रखने चेतावनी दी गई थी जिसे देखते हुए शिक्षा विभाग ने संस्थान खोले रखने निर्देश दिए थे।

सुप्रीम कोर्ट ने एसटी-एससी वर्ग के आरक्षण को क्रीमी लेयर और वर्गीकरण के आधार पर निर्धारित करने का निर्णय सुनाया है, जिससे इन वर्गों के गरीब तबके के लोगो तक भी आरक्षण का लाभ दिखाई दे और समान रूप से सबका विकास हो सके लेकिन निर्णय से तथाकथित वर्गों में आक्रोश है। उन्होंने आक्रोश जताने भारत बंद का ऐलान किया था, जिसे देखते हुऐ जिला शिक्षा अधिकारी ने सभी निजी और सरकारी स्कूल कॉलेजों को स्पष्ट निर्देश दिए थे कि बुधवार को संस्थान खुले रहेंगे। किसी के कहने या दबाव में शैक्षिक संस्थान बंद नहीं करना है, जिससे स्कूल और कॉलेज में छात्र-छात्राएं रोज की तरह पहुंचते रहे और कक्षाएं अटेंड करते रहे ।स्वामी आत्मानंद महाविद्यालय के प्राचार्य का कहना है कि भारत बंद का असर कॉलेज में नहीं है, सुचारू रूप से पढ़ाई जारी है। वही निजी स्कूल संचालक ने भी बताया की कक्षाएं अन्य दिनों की तरह चल रही है।

इस प्रकार जिले के सभी शैक्षिक संस्थानों पर भारत बंद का कोई असर दिखाई नहीं दिया। सभी जगह नियमित कक्षाएं चलती रही इससे बीच-बीच में एसटी-एससी ओबीसी महासंघ के सदस्य संस्थान बंद कराने पहुंचते रहे लेकिन लेकिन संचालकों ने संस्थान बंद करने से इनकार कर दिया, जिससे भारत बंद का असर जिले में कही दिखाई नही दिया। शहर के प्रमुख व्यापारिक संस्थान भी खुले रहे व्यापार विहार, बस स्टैंड स्थित राजीव प्लाजा, शनिचरी बाजार, गोलबाजार सहित सभी व्यापारिक संस्थान ,दुकान खुली रही और लोगों का आना-जाना जारी रहा।

भीमराव बाबा साहब अंबेडकर ने समाज के हाशिये पर खड़े वर्ग को न्याय दिलाने के लिए आरक्षण लागू किया था लेकिन आजादी के 76 साल बाद उस वर्ग के केवल 10% लोग ही मलाई चाट रहे हैं। शेष वंचित वर्ग के लिए जब सुप्रीम कोर्ट ने आवाज उठाई तो बड़ी बेशर्मी से इसका विरोध कर अपने ही समाज के लोगों का हक छिनने प्रयास किया गया और इसमें उन सामान्य वर्गों से भी सहयोग की अपेक्षा की गई जिनका इस पूरे मामले से कोई सरोकार नहीं है। यही कारण है कि यह बंद पूरी तरह से बेअसर रहा और आम लोगों ने इसे सिरे से नकार दिया।

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