कोनी स्थित कृषि महाविद्यालय के डीन से जी न्यूज ने की खास बातचीत, मोटे अनाज, एमएसपी सहित कृषि सम्बंधी विषय पर दी रोचक जानकारी।

एक समय था जब जिले और उसके आसपास क्षेत्र में दलहनी तिलहनी फसलों की सर्वाधिक पैदावार होती थी, धीरे-धीरे इसका स्थान अब धान ने ले लिया है इसका कारण दलहनी और तिलहनी फसलों का उत्पादन क्षमता धान की तुलना में कम होता है, एमएसपी अधिक होने के बावजूद उत्पादन क्षमता के चलते किसान धान को ही प्राथमिकता दे रहे हैं, कोनी के बैरिस्टर छेदीलाल कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता ने जी न्यूज़ से खास बातचीत में दोनो के बीच तालमेल का उपाय बताया है।

किसान अब दलहनी तिलहनी फसलों से ज्यादा धान को प्राथमिकता दे रहे है, जिसके चलते इन फसलों की पैदावार कम हो गई है। कृषि वैज्ञानिक की माने तो अच्छा किसान धान की खेती करें तो एक एकड़ में 15 से 20 क्विंटल धान की पैदावार कर सकता है जबकि दूसरी फसलों को देखे जिसमें मूंगफली अरहर अलसी उड़द मूंग की पैदावार करता है तो प्रति एकड़ 5 से 6 क्विंटल ही उत्पादन कर पाता है, इन दोनों फसलो के बीच 8 से 10 क्विंटल का अंतर आ रहा है, जिसके चलते किसान धान को प्राथमिकता दे रहा है, जिससे दलहनी और तिलहनी फसलों का उत्पादन पहले की तुलना में घट गया है। कोनी के कृषि महाविद्यालय के डीन ने इस विषय पर ज़ी न्यूज से विस्तार से बातचीत की।

कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि मिलेट कोदो कुटकी रागी का एमएसपी ज्यादा होता है उसके बावजूद भी किसान उत्पादन क्षमता के आधार पर धान को ही पसंद करता है, गौरतलब है कोदो कुटकी रागी का समर्थन मूल्य साढ़े तीन हजार प्रति क्विंटल हैं जबकि धान का 3100 रुपए है, इन दोनों के बीच में 8 से 10 क्विंटल का अंतर है लेकिन उत्पादन क्षमता के चलते किसान धान को ही प्राथमिकता देते हैं। कृषि जानकारों का मानना है तिलहनी, दलहनी फसलों को बचाना जरूरी है, इसके लिए सरकार को इन फसलों का समर्थन मूल्य बढ़ाना होगा। वही किसानों में भी व्यापारिक फसलों के प्रति भी जागरूकता लाना होगा तब जाकर व्यापारिक फसलों का उत्पादन बढ़ सकेगा।

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