
शहर में मच्छरों का आतंक दिनों-दिन बढ़ रहा है, लेकिन नगर निगम, जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को जनता की सेहत से ज्यादा फॉगिंग के ठेके और पेट्रोल-डीजल के बंदरबांट की चिंता है। निगम ने 8 जोनों में दो-दो फॉगिंग मशीनें भेजी थीं, जो अब ज्यादातर जोन ऑफिसों में धूल खा रही हैं या ऑपरेटरों के घरों में बंद पड़ी हैं। बावजूद इसके, इन्हीं मशीनों के नाम पर प्रतिदिन निगम के आदर्श पेट्रोल पंप से डीजल-पेट्रोल की उठाई जा रही है। शहर में डेंगू-मलेरिया का खतरा मंडरा रहा है, लेकिन अधिकारियों की नजर सिर्फ नए टेंडर की तैयारियों पर है।मीडिया ने जब फॉगिंग मशीनों का रियलिटी चेक किया, तो घोटाले का खुला खेल सामने आ गया। मशीनें खराब, फॉगिंग शून्य… लेकिन पेट्रोल-डीजल का रिकॉर्ड चौंकाने वाला। प्रति मशीन 12 लीटर डीजल और 5 लीटर पेट्रोल का रोजाना उठाव दर्ज है। सवाल यह उठ रहा है कि जब फॉगिंग हो ही नहीं रही तो ईंधन आखिर जा कहां रहा है।प्रशासन और निगम चुप हैं, और जनप्रतिनिधि अपने करीबियों को फॉगिंग का ठेका दिलाने की जुगत में लगे हैं।शहर की हालत यह है कि लोग घरों में कॉइल, अगरबत्ती और मशीनों पर निर्भर हैं, जबकि बाहर गलियों–चौराहों पर मच्छरों का आतंक चरम पर है। नवंबर से जनवरी तक संक्रमण का सबसे संवेदनशील दौर होता है, लेकिन 9 करोड़ रुपये हर माह सफाई पर खर्च करने वाले निगम की व्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है।नाले-नालियाँ बजबजा रही हैं, बदबू और मच्छरों के झुंड जनस्वास्थ्य पर गंभीर खतरे का संकेत दे रहे हैं।लोगों की लगातार शिकायतों के बावजूद जिला प्रशासन और निगम अधिकारियों की उदासीनता साफ दिख रही है।लार्वा कंट्रोल और फॉगिंग केवल कागजों में हो रही है,मैदान में कुछ भी नहीं। टेंडर-टेंडर के खेल में उलझे अधिकारी और जनप्रतिनिधि शहर को बीमारी की महामारी की ओर धकेल रहे हैं। यदि तुरंत बड़े और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में शहर में डेंगू-मलेरिया का बड़ा विस्फोट होना तय है।


