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बिलासपुर न्यायधानी कहा जाने वाला इस 70 वार्डों के शहर में इन दिनों एक अनदेखी ही सरकार चल रही है… इस सरकार ने शहर को कब्जे में ले लिया है… इस शहर का नाम है “मच्छरों की सरकार!”… घर, दफ्तर, स्कूल, अस्पताल—हर जगह इनका शासन चल रहा है… नगर निगम की मशीनें सड़कों पर आ ही नहीं रही… लार्वा कंट्रोल महीनों से ठप्प पड़ा है… लोगों की परेशानी लगातार बढ़ती जा रही है…

स्मार्ट सिटी बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा बिलासपुर अब मच्छरों की राजधानी बन चुका है… सिर्फ शाम और रात ही नहीं बल्कि अब तो दिन के वक्त भी मच्छरों का आतंक देखने को मिल रहा है… आलम ये है कि मच्छर के बारे में हर मोहल्ला… हर वार्ड एक जैसी कहानी कहता है… निगम की फॉगिंग मशीनें अब सिर्फ वीआईपी इलाकों तक सीमित हैं… बाकी शहर में तो मच्छर ही असली “वीआईपी” बन चुके हैं शहर की जनता अब खुद अपनी सुरक्षा खरीद रही है… लिक्विड, क्वॉइल, टिकिया, स्प्रे… अगरबत्ती… हर घर से रोज़ 20 से 30 रुपये तक का खर्च निकल रहा है…

गणना करें तो शहरवासियों के सालाना करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपये सिर्फ मच्छरों से बचाव पर खर्च हो रहे हैं… विडंबना ये है कि नगर निगम का एंटी-लार्वा और फॉगिंग बजट भी लगभग इतना ही है… लेकिन नतीजा नहीं निकल रहा… मच्छर बढ़ रहे हैं, बीमारियां फैल रही हैं… और फाइलों में सब “नियंत्रण में” बताया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े खुद मच्छरों के इस आतंक की हकीकत बयां करते हैं..

. साल 2024 में मच्छरों से जुड़ी बीमारी के कुल 245 केस रजिस्टर किए गए थे… लेकिन 2025 के जनवरी से सितंबर तक 9 माह में ही ऐसे 329 मामले सामने आ चुके हैं… निगम के दावों के उलट शहर के जनप्रतिनिधि इसके पीछे की सच्चाई बयान करते हैं

ये सच है कि शहर की आबोहवा अब मच्छरों के कब्ज़े में है… और जनता की सेहत, सुरक्षा और जेब — तीनों पर हमला जारी है… अब सवाल ये है कि कब तक प्रशासन इस हानिकारक सरकार के आगे नतमस्तक रहेगा… और कब इन पर काबू करने की दिशा में काम शुरू होगा।

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