
सनातन परंपरा में अन्नकूट के पर्व का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. यह पर्व हर साल दिवाली के अगले दिन कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा तिथि पर मनाया जाता है,अन्नकूट का पर्व पूर्णावतार माने जाने वाले भगवान श्री कृष्ण द्वारा इंद्र देवता के मान-मर्दन के उलपक्ष्य में मनाया जाने की परंपरा है।. लोकपरंपरा में इसे गोवर्धन पूजा के नाम से भी जाना जाता है.हिंदू मान्यता के अनुसार द्वापर युग में कार्तिक मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा वाले दिन देवताओं के राजा इंद्र को छप्पन प्रकार के भोग अर्पित किए जाते थे,

जब भगवान श्री कृष्ण ने इसका कारण माता यशोदा से पूछा तो उन्होंने बताया कि इंद्र देव जब वर्षा करते हैं तो हमारी गौवें और हमारी खेती बढ़ती फलती हैं, तब कान्हा ने कहा कि यह तो गोवर्धन पर्वत के कारण होता है. तब उन्होंने उस प्रथा को बंद करवा कर गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए सभी को कहा. जब यह बात इंद्र देवता को पता चली तो उन्होंने ब्रज मंडल में घनघोर वर्षा करवा दी. इससे बचने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अपनी कनिष्ठिका अंगुली पर गोवर्धन पर्वत को उठा लिया और उसे लेकर सात दिनों तक खड़े रहे.

इसके बाद जब इंद्र का अभिमान दूर हो गया और उसने भगवान श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी तो उन्होंने लोगों को इस दिन गोवर्धन की पूजा और अन्नकूट पर्व मनाने को कहा. लिहाजा तब से दिवाली के दूसरे दिन अन्नकूट का प्रसाद बनाकर भक्तों को ग्रहण कराया जाता है बिलासपुर में भी सभी कृष्ण मंदिरों में सुबह से ही अन्नकूट प्रसाद ग्रहण करने भक्ति कृष्ण मंदिरों में पहुंचने रहे।


