सावन आरंभ होते ही अंचल के सभी ऐतिहासिक और प्रसिद्ध शिव मंदिरों में शिव भक्तों का रेला उमड़ने लगा है। इन्हीं में से एक रतनपुर स्थित प्राचीन बूढ़ा महादेव का मंदिर भी है, जिसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है ।

रतनपुर को धार्मिक नगरी कहा जाता है। इसकी पहचान एक तरफ जहां सिद्ध शक्तिपीठ मां महामाया की वजह से है तो वहीं इसी क्षेत्र में प्राचीन बुद्धेश्वर महादेव का मंदिर भी है, जिसे स्थानीय भाषा में बूढ़ा महादेव भी कहा जाता है। यह स्वयंभू शिवलिंग है। मान्यता है कि इस शिवलिंग पर चाहे जितना भी जल अर्पित कर दे वह जल धरती में समाहित हो जाता है। वैसे तो यह मंदिर स्वयंभू है लेकिन राजा रत्न देव राय ने इसका जिर्णोद्धार कराया था। प्राचीन किवदंती है कि जंगल के बीच यह शिवलिंग मौजूद था, जहां एक गाय झाड़ियो में जाकर अपने थन से दूध अर्पित कर देती थी। इसके बाद राजा को स्वप्न आया और राजा ने इसके दर्शन किये। जिसके बाद इस मंदिर की स्थापना हुई।

महाशिवरात्रि और सावन के पूरे महीने में यहां दूर-दूर से श्रद्धालु भोले बाबा के दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। देवों के देव महादेव को प्रसन्न करने के लिए आसपास की पवित्र नदियों से जल लेकर कांवरिये पूरे महीने इस मंदिर पहुंचेंगे। इस मंदिर के पास ही छोटा सा जलाशय है। मान्यता है कि भोले भंडारी को अर्पित जल इसी जलाशय में चला जाता है। श्रद्धालुओं की बूढ़ा महादेव पर गहरी आस्था है और उन्हें लगता है कि यहां आने वाला कभी भी खाली हाथ नहीं जाता।



वैसे तो पूरे सावन मास में ही यहां श्रद्धालुओं का ताता लगा रहता है लेकिन सावन मास के सोमवार को यहां विशेष भीड़ नजर आती है। इस वर्ष सावन का आरंभ भी सोमवार से हो रहा है और सावन का समापन भी सोमवार से ही होगा। ऐसा संजोग 70 से भी अधिक वर्षों बाद हुआ है, जिसे लेकर शिव भक्तों में अति उत्साह है।


