
कटनी-बिलासपुर रेल सेक्शन की खोंगसरा टनल 118 साल पुरानी ब्रिटिशकालीन धरोहर, लेकिन आज भी ट्रेनें उसी पर चल रही हैं। फर्क बस इतना है कि अब यह इंजीनियरिंग नहीं, जुगाड़ और रिस्क मैनेजमेंट का प्रतीक बन चुकी है। रेलवे इस टनल को हर दिन बचा रहा है — लकड़ी के सहारे, हथौड़े की आवाज़ से, और कर्मचारियों की सतर्क निगरानी से 1907 में यूरोपियन इंजीनियरों द्वारा बनाई गई यह ऐतिहासिक टनल अब अपनी उम्र पार कर चुकी है, लेकिन रेलवे इसे आज भी उपयोग में ला रहा है। खोंगसरा टनल से ट्रेनें सामान्य रफ्तार पर नहीं चल पातीं मालगाड़ी को अधिकतम 10 किमी प्रति घंटे और यात्री ट्रेनों को केवल 20 किमी प्रति घंटे की अनुमति है। यह धीमी रफ्तार सावधानी नहीं, बल्कि टनल की कमजोर स्थिति और जोखिम का संकेत है।टनल के दोनों सिरों पर रेलवे के स्थायी पोस्ट हैं, जहां कर्मचारी 24 घंटे तीन शिफ्टों में तैनात रहते हैं। उनका काम सिर्फ एक ट्रैक की दूरी मापना। दाईं ओर 7 डिग्री के कर्व के कारण पटरियाँ खिसकने का खतरा रहता है। हल्की सी मूवमेंट भी अलार्म की तरह मानी जाती है। किसी भी दरार, पानी रिसाव या ट्रैक के फैलाव की जानकारी मिलते ही रेलवे सेक्शन से लेकर जोन तक की पूरी टीम एक्टिव हो जाती है।इस टनल की सबसे बड़ी चुनौती लकड़ी का सहारा।

दीवार और लाइन के बीच मोटी लकड़ियाँ लगाई गई हैं ताकि ट्रैक का फैलाव रोका जा सके। ट्रेन गुजरते ही ये लकड़ियाँ ढीली पड़ जाती हैं, जिन्हें कर्मचारी हर बार हथौड़े से दोबारा कसते हैं। यानी सुरक्षा का यह सिस्टम किसी हाईटेक सेंसर से नहीं, बल्कि इंसानों के अनुभव और हाथों की मेहनत से चलता है।रेलवे के नियमों के अनुसार, दोनों पटरियों के बीच 1675 गेज की दूरी होनी चाहिए, जिसमें 15 गेज तक का अंतर सामान्य माना जाता है। इससे अधिक होने पर डिरेलमेंट का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए खोंगसरा टनल में दिन में तीन से चार बार माप लेकर रजिस्टर में एंट्री की जाती है। बेस बोल्ट और चाबियाँ भी रोज कसी जाती हैं ताकि गुजरने वाली अगली ट्रेन पूरी तरह सुरक्षित रहे।रेलवे ने 1994-95 में टनल के नीचे का बलास्ट हटाकर कंक्रीट बेस बनाया था, ताकि पानी जमा न हो। अब पटरियाँ 52 किलो प्रति यूनिट रेल पैनल से 1215 बेयरिंग पर बोल्ट हैं। हालांकि, सुरक्षा के बावजूद खोंगसरा सेक्शन को आज भी ‘जोखिमभरा’ माना जाता है। कटनी से पेंड्रा तक तीसरी लाइन बन चुकी है, लेकिन पेंड्रा से बिलासपुर तक घाट और चढ़ाई की वजह से यह काम सबसे मुश्किल है। इसी कारण यहां तीसरे टनल का प्रस्ताव रखा गया है। रेलवे अधिकारियों का दावा है कि सदी पुरानी यह टनल अब भी सुरक्षित है क्योंकि इसकी मॉनिटरिंग कई स्तरों पर होती है। सीनियर डीसीएम अनुराग सिंह के मुताबिक, रेलवे की नियमित जांच और रखरखाव ने ही इन सौ साल पुरानी टनलों और ब्रिजों को आज तक संभालकर रखा है।लेकिन सवाल यह भी है कि कब तक।क्या भारत की सबसे पुरानी टनल लकड़ी और हथौड़े के सहारे ही जिंदा रहेगी या फिर तकनीक की नई पटरी पर इसका भी पुनर्जन्म होगा।


