
रेल दुर्घटनाओं पर रोक लगाने के लिए भारतीय रेलवे ने कवच प्रणाली की शुरुआत की थी। दावा किया गया था कि इस तकनीक के आने से ट्रेन हादसों में भारी कमी आएगी, लेकिन हालिया घटनाओं ने इन दावों की पोल खोल कर रख दी है। लगातार हो रहे हादसे यह दर्शा रहे हैं कि ‘कवच’ प्रणाली अभी भी केवल कागजों तक सीमित है। देशभर में भर्ती रेल दुर्घटनाओं में एक बार फिर से रेलवे की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं बिलासपुर में भी जिस तरह से दो दिनों पूर्व हुए रेल दुर्घटना ने कई सवालों को जन्म दिया है खासतौर पर रेलवे की कवच प्रणाली पर सवाल खड़े हो रहे हैं ऐसे में दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के बिलासपुर मंडल की बात करें तो यहां कवच प्रणाली पूरी तरह लागू नहीं हो पाई है। मंडल में लगातार सामने आ रही रेल दुर्घटनाएं इस बात की गवाही दे रही हैं कि कवच सिस्टम को लेकर कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।

बिलासपुर रेल मंडल के सीनियर डीसीएम ने बताया कि फिलहाल कवच प्रणाली तीन स्तरों पर काम कर रही है — कुछ जगहों पर इसे लागू किया गया है, कुछ स्थानों पर यह प्राथमिक स्तर पर है, जबकि कुछ इलाकों में अभी केवल ट्रायल चल रहा है। यानी पूरे मंडल में सिस्टम का संचालन अधूरा है। स्थिति यह है कि खुद रेलवे अधिकारी भी यह स्पष्ट नहीं बता पा रहे हैं कि कवच प्रणाली वर्तमान में कहां तक लागू हुई है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब रेलवे को खुद अपने सिस्टम की स्थिति का अंदाजा नहीं है, तो फिर हादसों पर रोक लगाने का दावा कैसे किया जा सकता है?हर बार की तरह, दुर्घटनाएं होती हैं, जांच होती है और कुछ कर्मचारियों पर कार्रवाई कर खानापूर्ति कर ली जाती है। लेकिन क्या इस तरह की औपचारिक कार्रवाई ही पर्याप्त है? क्या अब समय नहीं आ गया कि रेलवे अपनी तकनीकी योजनाओं को जमीन पर उतारे और ‘कवच’ जैसी सुरक्षा प्रणाली को केवल दिखावे की बजाय वास्तविक सुरक्षा कवच बनाए


